*पी आई आई टी काॅलेज के सभागार में राष्ट्रचिंतन का चौदहवां सुविचार सत्र "राजनीति में धर्म और नैतिकता" विषय पर आयोजित किया गया।*
By Har Govind Singh, 11:24:22 AM | April 24

ग्रेटर नोएडा:-सम्मानित मुख्य वक्ता श्री कृष्णानंद सागर जी, इतिहासकार व पूर्व प्रचारक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ने अपने संबोधन में कहा कि भारतवर्ष में सत्ता केंद्रित राजनीति इसके प्रादुर्भाव से ही रही है। पहले जो हमारे मन में लोकतंत्र था,वह वास्तव में राजतंत्र है। पश्चिमी लोकतंत्र से प्रेरित जनता की सहभागिता से लेकर राजनीतिक संस्थाएं ,जनप्रतिनिधि, सांसद, हर व्यक्ति पद प्राप्ति की लालसा लिए हुए था। पूर्व में सत्ता के लिए संघर्ष से सीमित व्यक्तियों के मध्य होता था। अब सामान्य व्यक्ति से शुरू होकर दल में सत्ता प्राप्ति की होड़ से लेकर तथा वार्ड से शुरू होकर सांसद तक का मार्ग प्रशस्त करती है। येन केन प्रक्रेण, नैतिक या अनैतिक किसी भी प्रकार सत्ता प्राप्ति ही ध्येय था। चारों तरफ यही भाव दिखाई पड़ता था।
1957 के चुनाव में रामपुर से मौलाना आजाद बिशन सेठ जी के विरुद्ध खड़े हुए। बिशन सेठ चुनाव में जीत गए, घोषित भी कर दिया गया। लेकिन जब यह बात प्रधानमंत्री नेहरू जी को पता चली, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पंत जी को फोन किया कि कैसे भी हो मौलाना साहब को जिताएं। पुनर्गणना में मौलाना साहब जितवा दिए गए ।
1957 में ही अमृतसर की स्राहवीन विधानसभा सीट से प्रताप सिंह कैरों उम्मीदवार थे। वह 33 वोट से हार गए। चुनाव अधिकारी बिना चुनाव नतीजे पर हस्ताक्षर करे, कोई बहाना बनाकर चले गए और बाद में आकाशवाणी जालंधर से उद्घोषक ने घोषणा की के प्रताप सिंह कैरों जी 66 वोट से चुनाव जीत गए। ऐसे ही अनेकों उदाहरण है ,जहां बड़े व्यक्तित्व द्वारा अनैतिक कृतियों को समाज के सामने सुंदर रूप में प्रस्तुत करने के लिए पारदर्शिता के साधन अपनाए गए । बूथ कैपचरिंग भी उनमें से एक साधन था।
राजनीति में वर्तमान परिदृश्य में भी अपनी विशेषताएं न बताकर विरोधी के अवगुण बताना , निंदा करना ,उसे अयोग्य बताना यह मूल मंत्र हो गया। अपनी विशेषता अपने दल का विषय और भविष्य के लिए योजनाएं गौण हो गई। लेख, नारे घटियापन व अनैतिकता का मूल हो गए हैं। समाज में धर्म धर्म आपके कर्मों को परिभाषित करते थे । धर्म का अर्थ है नैतिकता का भाव तथा अधर्म का अर्थ है अनैतिकता।
1952 का चुनाव हुआ कोई सभा नहीं हुई ,एक ही पार्टी थी। शांति से वोट पड़ गए ,कोई मुकाबले में भी नहीं खड़ा था ।1952 से ही अनैतिकता का बोलबाला शुरू हो गया। 1927 में जब नेहरू जेल से बाहर आए तो उन्होंने अपने संबोधन में कहा था कि लोगों में स्वार्थ आ गया, अनैतिकता आ गई। सत्ता प्राप्ति के लिए अनैतिकता आरंभ कब हुई ,किसने शुरू की, इसका आरंभ ऐसे व्यक्ति ने किया जो सबसे अधिक नैतिक माना जाता है। अफ्रीका से भारत आने पर तुर्की साम्राज्य जिसमें इराक जॉर्डन आदि देश थे उसके खलीफा के साम्राज्य को बहाल करने के लिए मुसलमान के आंदोलन को शह देने में गांधी जी की महती भूमिका थी। भारत के मुसलमान ने तुर्की के साम्राज्य को बहाल करने के लिए आंदोलन शुरू किया ।मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की बैठक में हिंदू नेता बुलाए गए और गांधी जी ने उस खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन का नाम दिया ।खिलाफत यानी खलीफा का पद और उसको बहाल करने के लिए असहयोग आंदोलन भारतवर्ष में चलाया गया, इसका भारत से कोई संबंध ही नहीं था। इस राजनीतिक शीर्षासन से भारत की जनता जो अंग्रेजों से स्वतंत्रता चाहती थी, वह बिना मतलब खिलाफत आंदोलन में जुड़ गई। इस प्रकार 1919 में गांधी जी ने ही विदेशी लोगों के लिए यह पहला अनैतिक आचरण भारतीय राजनीति में किया। अधिकतर मुस्लिम नेता जैसे मौलाना आजाद, अंसारी खिलाफत के नेता थे, इस आंदोलन का गांधी जी को सर्वेसर्वा बना दिया गया। खिलाफत आंदोलन अपनाने के लिए मजबूर कर कांग्रेस का आंदोलन बना दिया। जोर दिया गया कांग्रेस की प्रांतीय समितियां प्रस्ताव का अनुमोदन करें ।कांग्रेस के अप्रैल 1920 के अधिवेशन में इस प्रस्ताव को अपनाने का प्रयास किया गया ,अध्यक्ष ने एक विशेष अधिवेशन सितंबर 1920 में रखा। गुजरात का प्रांतीय सम्मेलन जुलाई माह में था। गुजरात प्रांत ने प्रस्ताव पारित कर दिया। सितंबर 1920 में राष्ट्रीय अधिवेशन कोलकाता में था । तिकड़म,अनैतिकता, निष्कृष्टता कहें एक विशेष रेलगाड़ी द्वारा मुसलमान को मुंबई से कोलकाता लाया गया ,जो कि कांग्रेसी नहीं थे। इस सब का वर्णन इंदु लाल याग्निक जी ने अपनी पुस्तक में किया है। सारे अधिवेशन में केवल मोतीलाल नेहरू ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। गांधी जी ने कहा कि गुजरात कांग्रेस ने प्रस्ताव पारित कर दिया है।अन्य नेताओं ने प्रस्ताव अस्वीकार करते हुए कहा कि यह कांग्रेस के संविधान के खिलाफ है। गांधी जी ने वोटिंग का दबाव बनाया, तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष लाजपत राय थे। जिन्हें 1907 में अंग्रेजों ने देशभक्ति के कारण देश निकाला दे दिया था 1920 में ही वह लौटे थे, उन्हें गांधी जी का अधिक परिचय नहीं था।
जिस कांग्रेस ने हर चुनाव में अनैतिकता कार्रवाई , उन्हे ही , विशेषकर गांधी जी को नैतिकता का मसीहा बनाकर प्रचारित ,प्रसारित किया गया। कुछ निडर नेता थे जैसे लोकमान्य तिलक जिन्होंने शिवाजी राज्य आरोहण दिवस व गणेश उत्सव की परंपरा भारतवर्ष के महाराष्ट्र प्रांत से शुरू कर पूरे देश में चलवाई। भारत ,भारतीय दर्शन व परंपराओं के बारे में अत्यंत स्पष्ट थे। जब के गांधी की कोई भी बात सीधी नहीं थी कहते कुछ थे और करते कुछ और थे ।राम का नाम कभी नहीं लिया गया,उनका चरित्र, उनका सम्मान कभी नहीं किया गया, और अंत में गांधी की अंतरात्मा अनेक दुष्कर्मों की जननी रही। कांग्रेस के प्राण, हृदय ,मस्तिष्क गांधी जी ने प्रदूषित किए। यह लाला लाजपत राय की कांग्रेस नहीं थी, जनता को गुमराह करना ,धोखा देना इसका परम लक्ष्य था। तत्पश्चात 1947 में 1950 में संविधान निर्माण के पश्चात कांग्रेस से अनेक निडर व चरित्रवान नेता विमुख हुए। कई दल बने, वामपंथी और भाजपा को छोड़कर कांग्रेस से निकले सभी दल कांग्रेस की विरासत का बोझ ढो रहे हैं। 1952 में जनसंघ बना सभी चरित्रवान नेता थे उन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन केवल तीन नेता जीत पाए। कांग्रेस के चुनाव जीतने के तरीके उन्हें पता ही नहीं थे।1975 में बेंगलुरु के जनसंघ मंत्री दिल्ली कॉर्पोरेशन का चुनाव देखने के लिए आए । उनकी रुचि थी कि कर्नाटक में अत्यंत व्यवस्थित कार्य होने के बावजूद जनसंघ क्यों वहां चुनाव जीत नहीं पा रहा है। उन्होंने कहा कि चुनाव ऐसे लड़े जाते हैं, जीते जाते हैं यह तो हमें पता ही नहीं है। लोहे को लोहा काटता है लोहे को सोने से नहीं काट सकते। संविधान बनने के बाद जनसंघ की अध्यक्षता श्यामा प्रसाद मुखर्जी जैसे चरित्रवान ज्ञानवान व्यक्तित्व के पास होने के बावजूद, जनसंघ जिसकी स्थापना एक विशिष्ट उद्देश्य के लिए हुई ऐसे नैतिक प्रमाणिक व्यक्तित्व के होने के बावजूद संसद सदस्यों के चुनाव में केवल तीन सीट ही जीत पाया। यह सब नैतिक तरीकों से चुनाव लड़े आना इतिक कार्य जो चुनाव जीतने के लिए किए जाते हैं वह तो इन्हें पता ही नहीं थे।
1963 में दीनदयाल उपाध्याय जी राजनाथ सिंह जी के विरुद्ध चुनाव लड़े। चुनाव में कांग्रेस ने जातिवाद का सहारा लिया तथा संख्या में अधिक ठाकुरों के मध्य राजनाथ सिंह का बढ़ चढ़कर प्रचार किया ,कम संख्या में होने पर भी जनसंघ वालों ने उपाध्याय जी को पंडित दीनदयाल कहकर प्रचार करने की कोशिश की। दीनदयाल जी ने कार्यकर्ताओं को बुलाया और उन्हें कहा कि मुझे हार स्वीकार है ,लेकिन जातिवाद पर वोट स्वीकार नहीं है और अंततः दीनदयाल जी चुनाव हार गए। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की कांग्रेस में उसके अंशजो ,वंशजों द्वारा समर्थित जातिगत जनगणना का प्रादुर्भाव शायद इस घटिया सोच का ही परिणाम है।
यह विषय प्रस्तुत करने का आशय यह है कि आप अपने सामने बड़ा पवित्र और भव्य लक्ष्य रखें ।महाभारत के युद्ध में भी विजय और धर्म की स्थापना आवश्यक थी। कौरवों की कुटिलता और अनैतिकता को सठे साठ्यम समाचरेत से अंकुश में रखा गया। विशेष आग्रह है कि इसे अपना साधन न बना लें ,और धर्म की स्थापना निश्चित ही करें।
प्रोफेसर विवेक कुमार ने कहा कि अटल जी की सरकार एक वोट से गिर गई थी लेकिन उन्होंने अनैतिकता का सहारा नहीं लिया। उन्होंने कहा कि नरसिम्हा राव जी की सरकार में पैसा देकर सांसदों का मत खरीदा गया। और आज के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में तृणमूल कांग्रेस की एक नेत्री पैसे लेकर संसद में प्रश्न पूछता हुई पाई गई। प्रश्न यह है कि केवल राजनीति या समाज में ही नहीं, हमारे निजी जीवन में कितनी नैतिकता है।
तत्पश्चात कुछ प्रबुद्ध व्यक्तियों ने प्रश्न किया
गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के शिक्षक नीरज कौशिक ने पूछा कि भारत वर्ष के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में विश्व के महानतम लोकतंत्र भारतवर्ष की स्वतंत्रता के अमृत काल में शुचिता और चरित्र की शुद्धता से ओत प्रोत युवा नेतृत्व का प्रादुर्भाव कितना संभव है।
उमेश जी निदेशक आईएमटी ग्रुप ऑफ़ कॉलेजेस ग्रेटर नोएडा नाम प्रश्न किया कि 400 बार के लिए क्या भाजपा भी अनैतिकता अपना रही है
टेन न्यूज़, परी चौक डॉट कॉम विजय चौक डॉट कॉम के संस्थापक गजानन माली जी ने सुझाव दिया कि युवा शक्ति, विद्यार्थियों और शिक्षकों को समाज को जागरूक करने में महत्व भूमिका निभानी चाहिए।
वरिष्ठ समाजशास्त्री एवं प्रोफेसर पांडे ने सुझाव दिया के राजनीति पर जातिवाद हावी है और उसके दुष्परिणाम है। मतदान आचरण मतदान व्यवहार विभक्त उद्देश्यों के लिए हो रहा है। इससे बचाव के लिए तथा समाज में सुधार के लिए हमारे उपलब्धता सुनिश्चित करनी पड़ेगी।
श्री राजेश बिहारी जी ने कहा कि लक्ष्य की पवित्रता आवश्यक है ।धर्म की स्थापना के लिए अगर किसी को मारना भी पड़े और वह राष्ट्रहित में है, तो उसमें कुछ गलत नहीं। जैसे कुमारवील भट्ट ने बौद्ध धर्म का नाश कर सनातन धर्म की स्थापना में अपना सहभाग किया। अच्छे उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए या धर्म की स्थापना के लिए जो किया जाए ,उसमें साध्य और साधन पवित्र होने चाहिए।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में राष्ट्रीय चिंतना के अध्यक्ष प्रोफेसर बलवंत सिंह राजपूत जी ,पूर्व कुलपति कुमाऊं व गढ़वाल विश्वविद्यालय ने कहा कि द्रोपदी के चीर हरण का सबसे बड़ा कलंक भीष्म व द्रोण पर है ।धर्म की व्याख्या सूक्ष्म है। राजनीति का प्रादुर्भाव कांग्रेस के द्वारा हुआ तथा इसकी बुनियाद ही अनैतिक है ,नैतिकता होती तो प्रथम प्रधानमंत्री पटेल होते ना कि नेहरू। अगर आपके साधन पवित्र हैं ,तो आपका लक्ष्य भी पवित्र होगा। उन्हें उन्होंने अपने निजी जीवन से उदाहरण देते हुए समझाया की कुमाऊं विश्वविद्यालय में कुलपति जी एक दुर्घटना में घायल हुए। तत्पश्चात 1992 में जब वह भौतिकी के वरिष्ठतम प्रोफेसर थे, सीपीएमटी की परीक्षा करवानी थी ।उन्होंने बिटिया से कहा कि या तो वह इम्तिहान ना दे या उन्हें त्यागपत्र देना पड़ेगा ।क्योंकि नैतिक होना और समाज में दिखाई देना दो अलग-अलग बातें हैं। नैतिक होना आवश्यक है ,लेकिन वह समाज को दिखलाई भी दे। पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न लाल बहादुर शास्त्री जी फटी धोती पहनते थे। रेल दुर्घटना होने पर रेल मंत्री के अपने दायित्व से त्यागपत्र दे दिया था ।ऐसा नहीं है कि कांग्रेस में सभी अनैतिक व्यक्ति ही थे ।बहुत से चरित्रवान ,नैतिक शुद्धता का आचरण करने वाले नेता भी थे।
आज के युग में अनैतिकता की चरम सीमा है। अपने काले कारनामों के कारण जेल में बंद एक नई क्रांति के जनक आज अपनी कारागार से रिहाई (बेल )के लिए मधुमेह लेवल बढ़ाने की निरर्थक कोशिश कर रहे हैं। विजय वही है जहां पवित्रता का भाव है, नैतिकता है। गंगा मैया में कितने भी नाले गिर जाए मां गंगा अपना स्वभाव नहीं छोड़ती और उन नालों का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। धर्मनिरपेक्षता का शब्द संविधान मैं संशोधन द्वारा सम्मिलित करना एक छलावा था। धर्मनिरपेक्ष नहीं धर्म विहीन कहना चाहिए। परिवार में पिता पुत्र सबके अपने धर्म है, सबके अपने कर्तव्य हैं। अपने-अपने धर्म का पालन अपने-अपने कर्तव्यों का पालन सबको करना पड़ता है। जहां धर्म है ,वहीं श्री कृष्ण है और, जहां श्री कृष्ण है, वहीं विजय है। धर्मनिरपेक्ष नहीं पंथनिरपेक्ष एक सार्थक शब्द होता। शिक्षक विद्यार्थी हर किसी का एक धर्म है अतः धर्मनिरपेक्षता एक छ्ल है।
धर्म को राजनीति में लाने वाले एक विषाक्त भावना से ओत प्रोत हैं।अभिव्यक्ति की आजादी मर्यादाहीन, अनुशासनहीन नहीं हो सकती, राष्ट्रद्रोह की परिचायक नहीं हो सकती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता निजी हित के उद्देश्यों से, किसी एक व्यक्ति ,या दाल का विरोध होते-होते राष्ट्रद्रोह का परिचायक बने तो यह ध्यान में रखा जाना चाहिए, कि राष्ट्रद्रोह मृत्यु दंड का भागी होता है।